About OSHOओशो किसी चीज को किसी श्रेणी में नहीं बांधते। उनके हजारों टॉक्स अर्थवत्ता की व्यक्तिगत तलाश से लेकर आज समाज के समक्ष उपस्थित सर्वाधिक ज्वलंत सामाजिक व राजनैतिक समस्याओं तक सब-कुछ पर प्रकाश डालते हैं। ओशो की पुस्तकें लिखी नहीं गई हैं, अपितु अंतर्राष्ट्रीय श्रोताओं के समक्ष उनकी तत्क्षण दी गई ध्वनिमुद्रित ऑडियो/वीडियो टॉक्स के संकलन हैं। जैसा कि वे कहते हैं: ‘‘तो याद रहे, मैं जो भी कह रहा हूं वह केवल तुम्हारे लिए ही नहीं… मैं भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी बोल रहा हूं।’’
ओशो को लंदन के दॅ संडे टाइम्स  ने ‘‘बीसवीं सदी के 1000 निर्माताओं’’ में से एक कह कर वर्णित किया है। सुप्रसिद्ध अमरीकी लेखक टॉम राबिन्स ने लिखा है कि ओशो ‘‘जीसस क्राइस्ट के बाद सर्वाधिक खतरनाक व्यक्ति हैं।’’ भारत के संडे मिड-डे ने ओशो को गांधी, नेहरू और बुद्ध के साथ उन दस लोगों में चुना है जिन्होंने भारत का भाग्य बदल दिया।
अपने कार्य के बारे में ओशो ने कहा है कि वे एक नये मनुष्य के जन्म के लिए परिस्थितियां तैयार कर रहे हैं। इस नये मनुष्य को वे ‘ज़ोरबा दि बुद्धा’ कहते हैं—जो ‘ज़ोरबा दि ग्रीक’ की तरह पृथ्वी के समस्त सुखों को भोगने की क्षमता रखता हो और गौतम बुद्ध की तरह मौन स्थिरता में जीता हो।
ओशो के हर आयाम में एक धारा की तरह बहता हुआ वह जीवन-दर्शन है जो पूरब की समयातीत प्रज्ञा और पश्चिम के विज्ञान और तकनीकी की सर्वोच्च संभावनाओं को एक साथ समाहित करता है।
ओशो आंतरिक रूपांतरण के विज्ञान में अपने क्रांतिकारी योगदान के लिए जाने जाते हैं और ध्यान की उन विधियों के प्रस्तोता हैं जो आज के गतिशील जीवन को ध्यान में रख कर रची गई हैं। उनके अनूठे ओशो सक्रिय ध्यान  इस तरह रचे गए हैं कि पहले शरीर और मन में एकत्रित तनावों का रेचन हो सके, जिससे रोजमर्रा के जीवन में सहज स्थिरता फलित हो व विचार-रहित विश्रांति अनुभव की जा सके।

ओशो की दो आत्मकथात्मक कृतियां:
ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए स्प्रिचुअली इनकरेक्ट मिस्टिक,
ग्लिम्प्सेस ऑफ ए गोल्डन चाइल्डहुड, (हिंदी पुस्तक: स्वर्णिम बचपन)

 

ओशो, आप अपने खुद के एक्सपीरिएंसेज, अपनी ऑटो-बायोग्राफी क्यों नहीं लिखते?
हां, यह सवाल ठीक है कि ‘मैं अपनी आत्म-कथा क्यों नहीं लिखता?’
अब यह बहुत मजेदार है। असल में आत्मा के जानने के बाद कोई आत्म-कथा नहीं होती। और सब आत्म-कथाएं अहंकार-कथाएं हैं। आत्म-कथाएं नहीं हैं, ईगो-ग्राफीज हैं। मेरी बात समझी न? पहला तो यह कि हम कहते हैं आत्म-कथा उसे, आत्म-कथा नहीं है। क्योंकि जब तक आत्मा का पता नहीं है तब तक जो भी हम लिखते हैं वह ईगो-ग्राफी है, वह अहं-कथा है।
इसलिए बड़े मजे की बात है कि जीसस ने आत्म-कथा नहीं लिखी, कृष्ण ने नहीं लिखी, बुद्ध ने नहीं लिखी, महावीर ने नहीं लिखी। न लिखी, न कही। आत्म-कथ्य जो है वह इस जगत में किसी भी उस आदमी ने नहीं लिखा जिसने आत्मा जानी है। क्योंकि आत्मा को जानने के बाद वह ऐसे निराकार में खो जाता है कि जिन्हें हम तथ्य कहते हैं वे सब उखड़ कर बह जाते हैं। जिनको हम खूंटियां कहते हैं–यह जन्म हुआ, यह यह हुआ, यह यह हुआ–वे सब उखड़ कर बह जाती हैं। इतना बड़ा अंधड़ है आत्मा का आना कि उस आंधी के बाद जब वह देखता है तो पाता है कि सब साफ ही हो गया; वहां कुछ बचा ही नहीं। कोरा कागज हो जाता है। आत्म-कथा लिखने का जो रस है वह आत्मा जानने के पहले है–जरूर है! इसलिए राजनीतिज्ञ आत्म-कथा लिखेंगे। साधु आत्म-कथा लिखेंगे। लेखक, कवि, साहित्यकार आत्म-कथा लिखेंगे। ये आत्म-कथाएं बहुत गहरे में ‘मैं’ की ही सजावटें हैं।

(ओशो: मैं कहता आंखन देखी)

See also The Osho Vision

 

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