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ओशो सम्मासति: मृत्युएक मूलभूत अंतर के साथ! क्या हो यदि मृत्यु का भय मिट जाए? अगर इसकी तैयारी के लिए कोई रास्ता हो, जैसे अन्य किसी भी यात्रा के लिए होता है? अगर आप और आपके प्रियजन न केवल शांतिपूर्वक बल्कि आनंद से मृत्यु में प्रवेश कर सकें?

सुसमाचार यह है कि मृत्यु को हम जिस तरह से देखा करते थे उस पर बहुत से लोग पुनर्विचार कर रहे हैं। हम इस धारणा पर सवाल उठा रहे हैं कि मृत्यु के बारे में जानने की इच्छा रुग्ण, जीवन-विरोधी और मृत्यु को और नजदीक लाने वाली है।

ओशो सम्मासति का दृष्टिकोण है (ब्रिटेन में मरणासन्न रोगियों के आश्रय-स्थल आन्दोलन के संस्थापक डेम सिसिली सॉन्डर्स के शब्दों में): मृत्यु उतनी ही प्राकृतिक है जितना कि जन्म। और, जैसा कि समकालीन रहस्यदर्शी ओशो कहते हैं: हम सब अपनी ही मृत्यु को अपने भीतर छिपाए हुए हैं।

हमारा दृष्टीकोण है: अगर आपको पता ही है कि मृत्यु अनिवार्य है, और इससे कुछ आशंकाएं और असुरक्षाएं उत्पन्न होती हैं, तो क्यों न इसे स्वीकार कर लिया जाए कि वे होती ही हैं और यह देखा जाए कि वे क्या हैं? इसकी तैयारी में उस समय तक देर करते रहना जब आप अपनी अंतिम श्वास ले रहे हों, ऐसा ही है जैसे कि आप अपने पैराशूट को तब बुन रहे हो जब आप पहले से ही विमान में बैठ चुके हो। या आप प्रसव-पूर्व प्रशिक्षण की कक्षाओं में भाग लेने का फैसला करने का तब तक इंतजार करते हो जब बच्चा बस जन्म लेने को ही हो!

मजेदार बात यह है कि मृत्यु के विषय में आप जितनी गहरी खोज करते हैं, उतना ही अधिक आप जीवंत अनुभव करते हो। अधिक से अधिक लोग अब अपने जीवन के अंतिम महीनों और दिनों के संबंध में पुस्तकें लिख कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब से उन्होंने यह स्वीकार किया किहां, मैं मर रहा हूं,’ तब से जीवन के पक्ष में उनके भीतर एक गुणात्मक परिवर्तन आया है।

इसको इस तरह से समझें: जब आप जानते हैं कि अब बस आपके पास कुछ ही क्षण शेष हैं, तब आप स्वयं को मिलने वाले प्रत्येक क्षण को ऐसा महत्व देते हैं जैसा आपने पहले कभी नहीं दिया था। इस बात का स्वीकार कि आपके पास कोई भविष्य नहीं है, कि जीवन कभी भी समाप्त हो सकता है, आपको उसमें धकेल देता है जो ठीक अभी है। समय का विस्तार हो जाता है। आप विश्रांत हो जाते हैं और एक विस्तीर्ण रूप में जान लेते हैं कि आप कौन हैं। आप एक त्वरा से जीने लगते हैं, प्रेम में ऐसी सघनता आते हैं जैसी आपने पहले कभी न जानी हो।

वे लोग जो मृत्यु के द्वार पर खड़े हैं, जो उन सभी को अलविदा कहने जा रहे हैं जिन्हें वे प्रेम करते हैं, जीवन को जिस रूप में उन्होंने जाना है उसे अलविदा कहने जा रहे हैंउन लोगों ने ऐसा लिखा है कि मृत्यु की प्रक्रिया न तो अंततः स्वयं को अपने भाग्य को सौंप देना है, न ही बस स्वीकार कर लेना है, बल्कि आनंद से भरी एक अवस्था है।

अगर आपके जीने का रंग-ढंग ऐसा हो गया हो, तो जब आपका शरीर अंतिम श्वास ले रहा होगा तो बिना किसी झंझट के आप शरीर को जाने दे सकेंगे…शांतिपूर्वक और यहां तक कि प्रसन्नता और कृतज्ञता के साथ।

यहां एक और मजेदार बात यह है: इस क्षण में विश्रांत और पूरिपूर्ण जागरूक अवस्था में जीवन को उसकी पराकाष्ठा में जीना, समय के विस्तार का बोध, अपने स्वयं के प्रति अपने को बदलते देखना, जगत से अधिक संबंधित महसूस करना, जीवंतता और आनंद की एक स्थिति का बन जानायही वह स्थिति है जिसका स्वाद हममें से बहुत से लोग ध्यान के माध्यम से चखते हैं! ध्यान एक प्राकृतिक मार्ग हैन केवल जीने के लिए, बल्कि मृत्यु के लिए भी।

ओशो सम्मासति सिखाना चाहता है

  उत्साहपूर्वक जीना, समग्रता और जागरूकता के साथ

  होशपूर्वक मृत्यु की तैयारी करना जो आपदा कम और उत्सव अधिक हो

उपरोक्त दोनों के लिए ध्यान एक प्राकृतिक मार्ग है।

आपको होशपूर्वक जीने और मृत्यु में आपकी सहायता करने और आपको समर्थ बनाने के लिए कि आप उनके लिए जिन्हें आप प्रेम करते हैं इस तरह से उपलब्ध हो पाएं कि उनकी मृत्यु एक अलग प्रकार से हो सके, उसके लिए हमारे पास अनेक उपाय हैं जिन्हें हम उपलब्ध कराते हैं। हमारे कार्य को समझने की मूलभूत कुंजी सम्मासति शब्द के अर्थ में छिपी है। एक कुंजी जो सबके लिए उपयुक्त है, जहां भी आप हों और जो कुछ भी आप अनुभव कर रहे हों।

सम्मासतीका अर्थ है सम्यक स्मरण।सम्यक स्मरणयह है कि हम केवल शरीर और मन से अधिक हैं: हम एक चेतना हैं। सम्यक स्मरण है स्वयं को साक्षी की उस अवस्था में ले जाना जहां हम शरीर की प्रतिपल बदलती अनुभूतियों के साथ-साथ मन में उठ रहे विचारों और भावनाओं को बस देख सकें। यह ध्यान का सार-सूत्र है।

ध्यान प्रत्येक के लिए उपलब्ध है, चाहे आपकी जो भी धार्मिक मान्यताएं हों या न हों। हम किन्हीं मान्यताओं को महत्त्व नहीं देते। ओशो दृष्टिकोण आपको एक रहस्यदर्शी की प्रज्ञा और अनुभव उपलब्ध कराता हैउपयोग करने के लिए एक अंतर्दृष्टि। ओशो के अपने शब्दों में, सिर्फ एक वैज्ञानिक परिकल्पना की तरह। हम व्यक्तिगत प्रयोगों का और उनसे अनिवार्य रूप से मिलने वाली समझ का समर्थन करते हैं। इसलिए हमारी कार्यशालाएं अनुभवात्मक होती हैं सैद्धांतिक नहीं।

जैसा कि हम देखते हैं, जो सहायता हम दूसरों कोउनके जीने या मृत्यु मेंउपलब्ध कराते हैं, जब यह हमारे खुद के अनुभव से निकलती है, तो स्वाभावतः वह गुणात्मक रूप से भिन्न होगीजब हमने मौन के आकाश और सर्व-स्वीकार का अनुभव किया हो, जब हमने समझा हो कि हमारे भीतर जाने के रास्ते में क्या रुकावट होती है और कैसे हम गहरे भीतर जा सकते हैं। इसलिए हमारा जोर इस बात पर है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति ध्यान की गहराई से परिचित हो, और हमारी व्यावहारिक कार्यशालाओं के माध्यम से यह खोजने के लिए एक अवसर प्राप्त कर सके कि हमारी अपनी मृत्यु हमारे लिए क्या अर्थ रखती है।

वर्कशॉप/इवेंट के प्रतिभागियों और वे जिन्हें व्यक्तिगत रूप से सहायता प्रदान की गई है उन लोगों की कुछ टिप्पणियां testimonials

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